Kulgeet

वीर बहादुर सिंह विश्व-विद्यालय का हरितांचल।
जय-जय-जय “पूरब की आत्मा”, जय-जय-जय “पूर्वाञ्चल”॥
पूर्व दिशा का ताज रहा है, “भारत का शीराज” रहा है,
यह यमदग्नि-यजन की बेदी यह “कुतबन” का मादल।
जय-जय-जय “पूरब की आत्मा”, जय-जय-जय “पूर्वांञ्चल”॥
दो धर्मों की मिलन-धुरी यह, राग सलोना “जौनपुरी” यह,
संघर्षों की झंझर में झंकृत जिसके जीवन-पल।
जय-जय-जय “पूरब की आत्मा”, जय-जय-जय “पूर्वांञ्चल”॥
नये सृजन की सजी आरती, उतरी वीणा लिये भारती,
नव-जागरण-थाल में अर्पित यह पावन तुलसी दल।
जय-जय-जय “पूरब की आत्मा”, जय-जय-जय “पूर्वांञ्चल”॥
कला-शिल्प-विज्ञान कलेवर, छलकाये प्रकाश के निर्झर,
धेनुमति-तमसा-गंगा का यह पावन क्रीड़ास्थल।
जय-जय-जय “पूरब की आत्मा”, जय-जय-जय “पूर्वांञ्चल”॥
नीति हमारी सरल-तरल हो, जिसमें जन का क्षेम-कुशल हो,
गौतम-कपिल-कणाद-पतंञलि हों आदर्श अचंचल।
जय-जय-जय “पूरब की आत्मा”, जय-जय-जय “पूर्वांञ्चल”॥